Thursday, June 3, 2021

हिसाब चुकता


 तूफान गरज रहा था। उनकी झोपड़ी मुश्किल से उठ रही थी। वह एक पुरानी रॉकिंग चेयर पर बैठ गया। एक गिलास बियर ने उसे गर्म रखा। उस रात गरज ही प्रकाश का एकमात्र स्रोत थी।


अचानक दरवाजा खुल गया। वहाँ एक मर्दाना आकृति खड़ी थी। उस पर कोई प्रकाश न पड़ने से वह परछाई की तरह लग रहा था।


 "वहाँ कौन है?" उसने पूछा, नाराज।


 "मैं जनता।" एक खाली आवाज ने कहा।


 "तुम क्या जानते हो? क्या यह किसी तरह का मजाक है? तुम क्या चाहते हो? तुम कौन हो?" उनकी झुंझलाहट बढ़ गई।


 "मुझे पता है कि आप उस आग के लिए जिम्मेदार थे।" आवाज में उछाल आया, आकृति में कोई हलचल नहीं हुई।


 "क..क..क्या? क्या आग?! तुम कौन हो?" वह ठिठक गया, डर गया।


 "मैं वहाँ था, जब तुमने वह माचिस जलाई थी।" 


 "आप क्या चुप रहना चाहते हैं? आप जो भी बोली लगाएंगे मैं आपको भुगतान करूंगा। बस इसे नाम दें।" वह जल्दी-जल्दी बोला, सीधा बैठ गया।


 "क्या आप निश्चित हैं? मैं जो कुछ भी पूछूंगा आप उसका भुगतान करेंगे?" छाया में आदमी से पूछा।


 "हाँ! ले लो और चले जाओ। मुझे मेरी चेकबुक लेने दो।" उसने जवाब दिया, राहत मिली।


 "मुझे नहीं लगता कि इसकी आवश्यकता होगी।" आवाज नफरत से गूंज उठी।


 "आपका क्या मतलब है? क्या आपको नकद चाहिए? मेरे पास सिर्फ 50 हजार हैं। मैं कल आपको बाकी लाऊंगा। तो आपको कितना चाहिए?" उसने कहा, दूसरे आदमी के जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है।


 "मुझे वह चाहिए जो मैंने खो दिया। और कुछ नहीं।"


 "ठीक है! मुझे तुम पर कितना कर्ज है?" वह फिर चिढ़ गया।


 "तुमने मुझे मेरी जान दे दी। यह वापस भुगतान करने का समय है।" छाया वापस खींची और गायब हो गई।


 अगले दिन की सुर्खियां-



"एक झोपड़ी में बिजली गिरी। जलकर राख हो गई।"



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